Saturday, August 25, 2018

"योम-असातज़ाह के मौक़े पर" | अनवर नदीम (1937-2017)



गर्मी के आंगन में हवा का ठहराव
वर्षाकाल में बादल को तरसते आकाश के नीचे
धुप की तेज़ी और जाड़े की बहारें
तूफ़ानी हवाओं की शहज़ोरी
सब कुछ बुरा लगता है !
ईद और होली मिलान में
शादी और सालगिरह की तक़ारीब में
हवसनाक फ़िल्मी गीतों का शोर भी
अच्छा नहीं लगता !
सियासी मंच पर
अक़्ल से पैदल लोगों के दरमियान
बद्तमीज़-ो-बेदिमाग़ भाषणों के होटों पर
उर्दू शाइरी के गन गान से वहशत होती है !
खालिस हिन्दुस्तानी महफ़िलों में
अमरीकी लिबास, विलायती खान पान
और अंग्रेज़ी ज़बान की कसरत
बहुत नागवार गुज़रती है !
अच्छी और सच्ची बात
अगर सही मुक़ाम पर
मुनासिब वक़्त पर कही जाए
तो सत्यम-शिवम्-सुंदरम के जादूई असर को
दूर तक फैला सकती है !

और पांच सितम्बर का मुबारक दिन
सत्यम-शिवम्-सुंदरम का प्रतीक है
और उसी प्रतीक के उजाले में
हर्फ़ों की पहचान, शब्दों का ज्ञान
संवाद का किरदार, वार्तालाप की रफ़्तार
हासिल करने वाली नस्लें
मिट्टी को सोना बनाने वाली हस्तियों के आगे
एहसान से झुक रही हैं
समरदार शाख़ों की तरह लचक रही हैं !
और यही वो मुनासिब वक़्त है
जब मिट्टी को सोना बनाने वाली हस्तियों से
दिल की बात कही जा सकती है !

ये ग़ैर मामूली काम
है तो बहुत ज़रूरी
कि इब्न-ए-आदम को
बिन्त-ए-हव्वा को
क़लम पकड़ने का हुनर सिखाया जाए
ताकि वो हर्फों, शब्दों, जुमलों की
बहती गंगा में आसानी से तैर सके
और काग़ज़ की किताब
किताब-ए-हस्ती के हर बाब को
सलीक़े से खोलने में उस की मदद करे !

मगर किताबों का बहुत भारी भोज
सर पे लादने का ये मतलब हरगिज़ नहीं है कि
इंसान अब दरिंदा नहीं बन सकता !
कोशिश कीजिये कि इंसान की औलाद
किसी भी सूरत में राक्षस ना बनने पाए !

इस हक़ीक़त को तस्लीम करने में
हर्ज ही क्या है कि
हमारी ज़मीन, हमारा समाज
रद्दे-अमल के ज़ेरे असर है !
तमामतर नेकियां, शरारतें
इख़लास, धोके
सब कुछ रिएक्शन का नतीजा हैं !
रोशन ज़मीर इंकलाबियों के साथ साथ
उभरने वाली तमामतर क़हर सामानियां
प्रतिक्रया की छोटी बड़ी कहानियां हैं !

फिर भी कोशिश यही करना है कि
घर, समाज, स्कूल, संस्थान
दानिशकदों के सरे दायरे
जागते रहें, जगाते रहें
ताकि किसी भी एक्शन
रिएक्शन के खेल में
दरिंदों के खेल में
दरिंदों को सांस लेने, करवट बदलने
सर उठाने का मौक़ा न मिले !

अनवर नदीम (1937-2017)

"बाल गोपाल की अज़मतों को सलाम" | अनवर नदीम (1937-2017)





मिरी मुहब्बत , मिरी अक़ीदत, मिरे तसव्वुर की चंद कलियाँ
अभी खिली हैं, महक रही हैं , मिरे कृष्णा! क़बूल कर ले

सफीर--शुजाअत , अनुराग वाला
वो ज़ुल्म--सितम के लिए आग वाला
वो बंसी बजैया, शरारत की धारा
वो चितचोर सारे जहां का दुलारा

उसी के जन्म की घडी रही है
बड़ी खूबसूरत फ़ज़ा छा रही है
चलो आज कर लें उसी का नज़ारा !

बालपन की हदों से जवानी तलक
हर ज़माना तहय्युरमआबी का है
जब ज़बां खोलता है तो लगता है ये
हर इशारा तग़य्युरमआबी का है

बाल गोपाल की अज़मतों को सलाम
इस्लाम को सपने में बसाये हुए "हसरत"
रखते थे कन्हैया के रवैय्यों से अक़ीदत

वो शाइर-दरवेश-सिफ़त ताज नगर का
हासिल थी उसे मेरे कृष्णा की मुहब्बत

बाल गोपाल की अज़मतों को सलाम

क्या ख़ूब था गोपाल के बचपन का तमाशा
माखन के बहाने से बना चोर कन्हैया
मुंह खोल के दुनिया को दिखाया था अजूबा
मासूम शरारत में रसूलों का रवैय्या !

देखा है सदा आपने सूरज को उभरते
हम ने तो हमेशा यही महसूस किया है
धरती को अंधेरों से करेगा यही आज़ाद
गोपाल के किरदार की तस्वीर है सूरज

बस्ती बस्ती, द्वारे द्वारे, झांकी कृष्ण कन्हैया की
"ख़ल्क़ख़ुदा की देखन आई" मीर का फ़िक़रा याद करो

एक यही पैग़ाम सुनहरा, भारत वर्ष के दर्शन का
"कृष्णा, कृष्णा" कहते कहते अपने मन को शाद करो

ज़मीन--आकाश की हदों में जहां भी देखो मैं डोलता हूँ
तमाम फ़िक्र--अमल की गिरहें, अज़ल से अब तक मैं खोलता हूँ
बहुत सवेरे, वो कौन मेरे, क़रीब आके, ये कह गया है
"मैं हर्फ़--आख़िर कहाँ से लाऊँ, मैं हर ज़माने में बोलता हूँ"

झलकियां -फ़िक्र--नज़र की अष्टमी की राह में
अनवर--ख़स्ता की काविश कृष्ण की इक चाह में
पेश करके रूह मेरी हो चुकी है शादमां
दिल को सब कुछ मिल गया आप की इस वाह में !

(अनवर नदीम)