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Wednesday, August 9, 2023

जब याद करो तुम अनवर को...

- नवरस आफ़रीदी 



जब याद करो तुम अनवर को, तब सोचना उसकी बातों को 

जब नींद न आये रातों को, जब चादर ठंडी लगती हो !

- अनवर नदीम 

अनवर नदीम मुसलमान नहीं थे, पर उनकी अंत्येष्टि इस्लामी पद्धिति से हुई।  ऐसा नहीं है की उन्होंने इस बात को कभी राज़ रखा हो और ना ही ऐसा कि उनकी पत्नी या संतान मुसलमान हों।  इसका सरोकार केवल इस बात से है कि उनका जन्म एक मुसलमान परिवार में हुआ था, हालांकि वे मुसलमान नहीं थे।  लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं कि उन्होंने उसके स्थान पर किसी अन्य धर्म को स्वीकार कर लिया हो।  उनकी जिस नज़्म में उनकी आस्था सिमट आई, वो है 'हमारे क़ातिल':


मौत की नींद से पहले भी इन्हें देखा था
आख़िरी बार यही लोग मिले थे हम से
अपनी तारीक-मिज़ाजी को सजाये रुख़ पर
अपनी उलझन को लपेटे हुए अपने सर पर
उंगलियां ज़ुल्म की, तस्बीह के दाने मजबूर
भोंडे माथे पे सजाये हुए चावल की लकीर
ख़ुद उड़ाते हुए कुछ ज़ौक़े-सलीबी का मज़ाक़
पीली चादर में समेटे हुए काली रूहें
अपने होटों पे सपेदी को लपेटे चेहरे
मौत की नींद से पहले भी इन्हें देखा था 
आख़िरी बार यही लोग मिले थे हम से। 

हमने फूलों की हंसी, चाँद की किरनें लेकर
जी में ठानी थी बसायेंगे महब्बत का जहां
बस यही लोग तभी आये ये कहने हमसे

ज़िन्दगी रस्म के संसार में आबाद करो
रूह के पाँव में ज़ंजीर-ए-इबादत डालो
कोहना अफ़कार की चादर को लपेटो सर से
और सजदे में झुकाओ ये महब्बत की जबीं। 

मौत की नींद से पहले भी इन्हें देखा था 
आख़िरी बार यही लोग मिले थे हम से। 

इन की बातों पे हंसे, हंस के यही हम ने कहा
हम नहीं ज़ौक़े-इबादत से पिघलने वाले
हम नहीं अपने इरादों को बदलने वाले
अपने कानों में फ़क़त दिल की सदा आती है
हम कहाँ दहर की आवाज़ सुना करते हैं। 
हम को क्यों रस्म के संसार में ले जाओगे
हम को क्यों कोहना रवायात से तड़पाओगे
हम हैं आवारा-मिज़ाजी के पयम्बर, यारो। 
हम से गर सीख सको, सीख लो जीना, यारो। 

मौत की नींद से पहले भी इन्हें देखा था

आख़िरी बार यही लोग मिले थे हमसे।


वे क्या थे और कौन थे इसका अनुमान इन तीन अशआर से बख़ूबी हो जाता है: 

"हम मज़हब-वजहब क्या जानें, हम लोग सियासत क्या समझें

हर बात अधूरी होती है उम्मीद के ठेकेदारों की" 

"बहुत सवेरे वो कौन मेरे क़रीब आके ये कह गया है 

मैं हर्फ़-ए-आख़िर कहाँ से लाऊँ , में हर ज़माने में बोलता हूँ" 

"ज़िन्दगी की तड़प, उसकी  समझ, शाइरी की लगन और काफ़िर क़लम, बस यही हर घड़ी साथ मेरे रहे, दिन, महीने, बरस गुनगुनाते रहे, शेर होते रहे, गीत बुनते रहे

फ़िक्र-ो-फ़न के लिए, ज़िन्दगी की ख़ुशी, प्यार की आरज़ू, रूह की ताज़गी, सब लुटाता रहा, ख़ुद बिखरता रहा, इस तमाशे की लेकिन किसे है ख़बर, मैं नज़र में ज़माने की आया नहीं" 


वे वास्तव में "नज़र में ज़माने की" आये नहीं।  यही कारण है कि जब उनके देहांत पर लोगों ने उन्हें श्रद्धांजली अर्पित की, चाहे ज़बानी या लिखित, तो उल्लेख उनकी मेहमाननवाज़ी (अतिथिसत्कार) का रहा ना कि साहित्य में उनके योगदान का।  

वे साहित्य और समाज के एक कटु समालोचक थे और किसी भी सामूहिक पहचान से बहुत दूर - चाहे उस पहचान का आधार हो धर्म या नस्ल या राष्ट्रीयता या क्षेत्रीयता या जाति या राजनैतिक/सामाजिक विचारधारा या भाषा या सभ्यता।  उन्होंने कभी भी किसी भी साहित्यिक सभा या संस्था की सदस्यता नहीं अपनाई।  भरपूर जीवन जिया, पर सामाजिक जोड़तोड़ और साहित्य क्षेत्र की राजनीति से बिलकुल अपरिचित रहे।  इसको वे ख़ुद यूं बयान करते हैं: 

घर से दूर, ख़ानदान से अलग, सरहदों का दुश्मन, रस्मी बंधनों से आज़ाद, दीनी हुजरों से नावाकिफ, समाजी तमाशों से बेज़ार, सियासी गलियों से गुरेज़ाँ, फ़िक्री दायरों से बेतआल्लुक, घर-आँगन में बाज़ारी रवैय्यों की ठंडक से मुज़महिल, टूट'ती-बिखरती क़द्रों के लिए अजनबी, मगर अपनी आज़ाद मर्ज़ी से उभरने वाले चाँद उसूलों का सख़्ती से पाबन्द, नामवर लोगों के दरमियान मग़रूर-ओ-मोहतात, बेनाम चहरों का बेतक्कालुफ़ साथी, काग़ज़ी नोटों के तालुक से फ़ज़ूलख़र्च, मगर आरज़ू करने, राय बनाने, प्यार देने और वफ़ादारी बरतने की राह में इन्तिहाई बख़ील । कुछ कर गुजरने की सलाहियत से मामूर, मगर साथ ही ख़्वाहिशों की दुश्मनी से भरपूर - बेटा बना, न भाई, साथी बना न दोस्त, किसी भी राइज कसौटी पर पूरा उतरने की सलाहियत से महरूम। घर, समाज, नस्ल, कौम, वतन, दीन, ज़बान, तहजीब, खून, तारीख़  - किसी भी त'आसुब, जज़्बे या इज़्म से फूट के बहने वाले गहरे, लंबे, खुशरंग, ख़ौफ़नाक दरयाओं के ठन्डे, गुनगुने पानियों से बहुत दूर - तन्हा और उदास, बोझल और प्यासा!

(मैदान, पृष्ठ 9)

सामाजिक पहचानों से उनकी चिढ़ व्यक्त होती है  उनकी नज़्म  'असीर-ए-जमाअत' में:

ऐ मेरे दोस्तों !
ऐ मेरे साथियो !
तुम इसी अहद के 
मैं इसी दौर का 

ज़िन्दगी का अलम 
आत्मा की खुशी 
तीरगी का सितम 
रौशनी की कमी 
ग़म तुम्हारा मेरे दिल का मेहमान है 
मेरा ग़म है तुम्हारे दिलों में मकीं 

ज़िंदगी को मगर देखने के लिए 
सोचने के लिए, नापने के लिए 
ज़िंदगी को बरतने की खातिर मगर 
ज़ाविया भी अलग 
फ़ासला  भी अलग 
हौसला भी अलग 

तुम उठाये रवायत की भारी सलीब 
तुम बग़ल में दबाये पुरानी किताब 
तुम जो लफ़्ज़ों के दर्पन को छू लो अगर 
छूट जाए वहीं दस्त-ए-तासीर से 
तुम पुराने ज़मानों से मानूस हो 
तुम की भुझते चराग़ों की तक़दीर हो 
तुम असीर-ए-जमाअत, मेरे साथियो !
तुम कहाँ फरदियत को करोगे क़बूल 

वे खुद अपने सबसे बड़े दुश्मन थे और इसका उन्हें एहसास भी था जिसका अंदाज़ा उनके इन दो अशआर से बख़ूबी होता है: 

मेरे अपने हाथ में ख़ंजर, उस पर मेरे दिल का ख़ून 
मेरा क़ातिल कौन है दुन्या, आख़िर अपने मुँह से बोल !

मैं इन्क़िलाब की मंज़िल जीत भी लेता  

मेरे मिज़ाज की बिल्ली ने रास्ता काटा ! 

उनका स्वभाव बिलकुल उस पात्र के जैसा था जिस अंतिम किरदार को उन्होंने अपने नाट्य जीवन में निभाया - शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाटक मृचकटिकम का मुख्य पात्र चारुदत्त जो अपनी सारी धन-दौलत अपने मित्रों के अतिथिसत्कार और मनोरंजन में खो देता है।  चारुदत्त को प्यार था वसंतसेना से।  उसी प्रकार चारुदत्त का पात्र निभाने वाले अनवर नदीम को महब्बत हो गयी वसंतसेना का पात्र निभाने वाली उनकी सह कलाकार डॉ. मंजु  सिकरवार से।


वे रंगमंच में सक्रिय तो थे पर साथ ही बदनाम भी थे रेहर्सल्स में नियमित रूप से आने के बावजूद अस्ल मंचन के दिन ग़ायब हो जाने के लिए।  जब वसंतसेना (जिस नाम से शूद्रक के नाटक मृचकटिकम को डॉ. मंजू सिकरवार द्वारा स्थापित नटराज रंगशाला मंचित कर रही थी) के अस्ल शो का दिन आया तो अनवर नदीम की आँखें नम थीं इस चिंता से कि अब रेहेअर्सल्स के सिवा मंजु जी से मिलने का और क्या बहाना होगा।  यह ऐसा पहला नाटक था जिसके फ़ाइनल शो में वे मंच पर अवतरित हुए।  शो की समाप्ति के बाद भी मुलाक़ातों का सिलसिला यथावत रहा। अंततः अनवर ने प्रेम अभिव्यक्त कर ही दिया।  जवाब में इक़रार तो हासिल हुआ पर एक शर्त के साथ - कि वे बी. ए. (BA) की डिग्री प्राप्त कर लें।  वे सत्रह बरस से हर साल बी. ए. पार्ट २ में दाख़िला लेते रहे थे और हर बार परीक्षा में बैठने के उद्देश्य से निकलने के बावजूद रास्ते में किसी भी जानकार के मिल जाने पर किसी भी चायख़ाने का रुख़ कर बैठे थे और इस प्रकार इम्तिहान अगले साल के लिए मुल्तवी करते रहे थे।  मंजु की इस शर्त के परिणाम स्वरूप बी. ए. की सारी परीक्षाओं से सफलता के साथ गुज़र गए और बी. ए. डिग्री के साथ मंजू का साथ भी प्राप्त कर लिया जीवन संगनी के तौर पे।  


आज ऐसे विवाह को "लव-जिहाद" का नाम देने में लोग बिलकुल संकोच नहीं करेंगे हालांकि यह शादी भारतीय संविधान के विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत सम्पन हुई और इसमें कोई धर्म परिवर्तन नहीं हुआ।  चाहे संकोच के साथ या दिल पर पत्थर रख के दोनों ही ख़ानदानों ने शादी को स्वीकार कर लिया।  मंजु के मथुरा निवासी आर्यसमाजी हिन्दू जाट ख़ानदान ने भी और अनवर के मलिहाबाद निवासी पठान मुस्लिम खानदान ने भी।  ऐसी सहजता के साथ उनके विवाह के स्वीकार होने का शायद मुख्य कारण यह था कि दोनों ने उम्र की उस मंज़िल पर शादी की थी जब उनके ख़ानदान उनकी शादी की सारी उम्मीदें छोड़ चुके थे।  अनवर ३८ के थे और मंजु ३७ की।हालांकि उनके झूठे जन्म प्रमाणपत्र के अनुसार वे उम्र में मंजु से छोटे थे।  जन्म प्रमाणपत्र के मुताबिक़ उनका जन्म १ फ़रवरी १९४२ को हुआ था न की २२ अक्टूबर १९३७ को।  

विवाह के दो वर्ष उपरान्त नाचीज़ का जन्म हुआ।  पैदाइश से पहले ही अनवर तय कर चुके थे कि नाम होगा 'नवरस', किसी भी ग़ैर-ज़रूरी पुछलग्गे के बग़ैर।  मगर आख़िरकार स्कूल के दबाव में पुछलग्गे जुड़ ही गए नाम से।  

उनका जीवन दर्शन उनकी जिस नज़्म में झलकता है वह है 'सीधी सी बात': 


हर एक शहर को नफ़रत है इब्न-ए-आदम से 

हर एक मक़ाम पे मेला है तल्ख़-कामी का 

हर एक अहद में सूली उठाये फिरते हैं 

वो चंद लोग जो दुनिया से दूर होते हैं 

वो चाँद लोग जो ठोकर पे मार देते हैं 

कुलाह-ो-तख़्त-ो-सियासत की अज़मतें सारी 

ज़मीं उन्हीं को पयाम-ए-हयात देती है 

वही पयाम जिसे तुम अजल समझते हो।     

 



Saturday, March 25, 2023

आज़ाद वतन बेदार रहे


इक बात हमें भी कहना है, आज़ाद वतन के लोगों से 

मज़दूरों से, बंजारों से, फनकारों से, बेचारों से 

इस देश के चप्पे चप्पे पर जब खून बहाया ग़ैरत ने 

जब ज़ुल्म से टक्कर लेने का तूफ़ान उठाया ग़ैरत ने 

जब बूढ़ी नस्लें चीख पड़ीं, जब कमसिन बच्चे जाग उठे 

जब बेजां पत्थर बोल उठे, जब नाज़ुक शीशे जाग उठे 

बाज़ार में जब बेदारी थी, जब खेतों में चिंगारी थी 

आज़ाद वतन के ख़्वाबों की हर पैकर में सरशारी थी 

हर जज़्बा जब खुदगर्ज़ी का, जीने की तड़प खो जाता था 

आँचल से परचम बनते थे, तलवार, क़लम हो जाता था 

जब दौलत, इज़्ज़त, शोहरत को ठोकर पे मारा लोगों ने

आज़ाद वतन की चाहत में जब मौत को चूमा लोगों ने 

जब आज़ादी की नेमत ही इस जीवन का आधार हुई

तब आज़ादी के सपनों की रंगी दुनिया साकार हुई 

पर जान से प्यारी आज़ादी, तारीख़ का सीधा मोड़ नहीं 

इस जान से प्यारी नेमत का संसार में कोई जोड़ नहीं 

आज़ाद वतन आबाद रहे, खुशहाल रहे, बेदार रहे 

चौपाल कहे, सरकार सुने, घर बार बसे, बाज़ार सजे 

इक बात हमें भी कहना है आज़ाद वतन के लोगों से 

मज़दूरों से, बंजारों से, फ़नकारों से, बेचारों से 

- अनवर नदीम (1937-2017)




Sunday, January 15, 2023

एक गीत












उसकी सुन्दर काया में 

अपने घर ले आये हम 

गांव का सारा भोलापन।  

फिर भी चिंता रहती है
 
शहरों से घबराएगा 

उसका सीधा सादा मन।  

अनवर जी की इच्छा है 

उसकी रचना शक्ति से 

उभरे ऐसा उजला फ़न !

जीवन को दर्शाता हो 

राह नई दिखलाता हो
 
गीत, ग़ज़ल, जैसा दर्पन।  

अनवर नदीम (1937-2017)


Thursday, October 27, 2022

अनवर नदीम एक प्रकाशक और साहित्यिक पत्रकार की भूमिका में



अनवर नदीम साहब ने प्रकाशन के मैदान में भी किरदार अदा किया।  आपने हमलोग पब्लिशर्स की बुनियाद रक्खी, जिसके ज़ेरे एहतमाम (तत्वावधान में) कई उर्दू किताबें शाया (प्रकाशित) कीं, नस्र (गद्य) और शाइरी (काव्य) दोनों की, उर्दू और देवनागरी, दोनों ही लिपियों में।  डाइजेस्ट (digest) की शक्ल में एक अदबी जरीदा (journal) भी निकाला, जिसके आप खुद मुदीर (सम्पादक) थे।  जरीदा ज़खीम और शानदार था पर उसका दूसरा शुमारा (अंक) कभी मंज़र-ए-आम पर (सामने) ना आ सका।  जरीदे का नाम था अदबी चौपाल ।  उसी से उनके पेश लफ्ज़ (प्रस्तावना) का कुछ हिस्सा आपने अपनी ग़ैर-मतबुआ (अप्रकाशित) सवाने-हयात (आत्मकथा) ख़ानाख़राब में पेश किया: 

मैंने हमेशा यही किया है, बाग़ात बेच कर फ़िल्में देखी हैं, कपड़े बनवाये हैं, चायख़ाने आबाद किये हैं, लोगों को तोहफ़े दिए हैं, और अपनी किताबें छपवाई हैं।  क़ैसर मंज़िल बेच कर भी यही किया - फ़िल्में देखीं, कपड़े बनवाये, चायख़ाने आबाद किये, बहुत से लोगों को तोहफ़े दिए, और सहमाही पर्चा अदबी चौपाल निकालने की कोशिश की।  

आइना कोई दिखाए तो बुरा लगता है।  

तंज़ीमकार 
मुकर्रमी..........की ख़िदमत में 
ख़ुलूस-ो-अदब  के साथ।  

हमलोग पब्लिशर्स की तरफ़ से जुलाई 1976 के पहले हफ़्ते में एक सहमाही पर्चा अदबी चौपाल के नाम से आ रहा हैं।  अदबी चौपाल के इब्तिदाई शुमारों को अपाहिज वज़ीरों और खोखले दानिशवरों के पैग़ामात से भरने का कोई इरादा नहीं है; हमें ज़रुरत है अपने बुज़र्गों और दोस्तों की सच्ची और खरी बातों की।  क्या हम उम्मीद करें कि आप मुंसलिक पोस्टकार्ड को इस्तेमाल करने की ज़हमत गवारा फ़रमाएंगे ? 

ख़ैर-अंदेश 

बस इसी ख़त की 231 कॉपियां 16 मई से जून 1976 के पहले हफ़्ते की दरमियानी मुद्दत में हिन्द-ो-पाक के मुख़्तलिफ़ पतों पर बिखेर दी गयीं।  इसी ज़बान, इसी मज़मून, इसी लहजे, इसी ख़त की एक-एक कॉपी, वो भी हाथ से लिखी हुई मोहतरमा इंदिरा गाँधी साहिबा, फ़ख़रुद्दीन अली अहमद, सैय्यद नूर उल-हसन, वी. सी. शुक्ला, अली यावर जंग, शेख़ अब्दुल्लाह, चन्ना रेड्डी, नारायण दत्त तिवारी, अम्मार रिज़वी, श्रीमती मोहसिना किदवाई, और मोहतरमा आबिदा फखरुद्दीन की ख़िदमत में भी रवाना की गयी।  मगर...पुर अम्न इंक़िलाब की उजली अलामत श्रीमती इंदिरा गाँधी, यू. पी. के गवर्नर डॉ. चेन्ना रेड्डी के अलावा, अपने उन तमाम अच्छे, सच्चे और वफ़ादार साथियों के साथ ख़ामोश रहीं।  मुमकिन है हमें इसी बात का अफ़सोस भी हो। 

हज़रत फ़िराक़ के साथ ही सरदार, कैफ़ी, निसार, साहिर, और अख़्तर भी बेनियाज़ रहे।  कृष्णा की देखा-देखी, बेदी, ख़्वाजा, हैदर, और वाजिदा ने भी चुप साध ली।  फ़ारूक़ी ने जवाब नहीं दिया तो कुमार पाशी, बलराज कोमल, अमीक़ हन्फ़ी, वहाब दानिश, शहरयार, अतीक़ुल्लाह, और कृष्णा मोहन अपने साथियों की तरह जवाब कैसे दे सकते थे।  हयातुल्लाह और अहमद सईद, इशरत अली और गोपाल मित्तल, उस्मान ग़नी और बिशन कपूर या हामिदा हबीबुल्लाह और सबाहुद्दीन या मलिकज़ादा और वली उल-हक़ या ख़लीक अंजुम और जगन नाथ या मक़बूल अहमद लारी और शैख़ नेमतुल्लाह - इन तमाम होशमंद हज़रात की ख़ामोशी तो समझ में आती है, लेकिन वली कमाल और माइल मलीहाबादी जैसे निडर, नए या पुराने लोगों को क्या हो गया?  यूसुफ़ देहलवी और रहमान नैय्यर को शायद इस बात का एहसास ही नहीं कि उनकी चुप सहाफ़ती आदाब के बिलकुल ख़िलाफ़ है।  अफ़सोस है कि इसी शहर में रतन, आइशा, अंजुम, और अनीस अभी तक एक मामूली ख़त के तजज़िये में मसरूफ़ हैं।  दिलीप कुमार तो ख़ैर मुशायरों की सदारत में लगे हुए थे मगर फ़िल्मी दुनिया के दुसरे लोग क्या कर रहे थे, हमें नहीं मालूम।  अफ़सोस की यशपाल, भगवती चरण और ठाकुर प्रसाद ने भी हमें किसी लायक़ नहीं समझा।  हाँ पाकिस्तानी अदीबों ने हमारी आशाएं पूरी कीं - यानी सब के सब ख़ामोश रहे।  खैर शिकायतें ख़त्म, बात शुरू।  

ये कोइ बुरी बात नहीं कि ज़्यादातर लोग, अपाहिज वज़ीरों और खोखले दानिश्वरों वाले जुमले पर उछाल पड़े हैं,  तालियां बजायी हैं, और अपनी ख़ुशी का इज़हार किया है।  मगर ताअज्जुब है की बाज़ रूहें सन्नाटे में आ गयी हैं  ये सुन कर कि कोई सरफिरा निकला है सच्ची और खरी बातों की तलाश में।  लोगों को हैरत है इस खरे और सच्चे मुतालबे पर।  सभी को अपने युग की बेबसी का एहसास है।  ये भी कोई बुरा नहीं है मगर सवाल ये भी है कि हम जिस दौर में जी रहे हैं वो हक़ीक़त में है क्या? क्या आज हिन्दुस्तान में लगी बेशुमार पाबंदियां इस लिए हैं कि तामीर और अमल के पहिये रोक दिए जाएँ? जी, हरगिज़ नहीं ! लूट-खसोट और बेहिसी के बेपनाह घने और काले जंगल में अच्छी सफ़ाई के लिए मज़बूत सख़्ती और शदीद पाबंदियों की ज़रुरत थी।  हम इंसान दोस्ती के गहरे जज़्बे में यक़ीनन इन पाबंदियों का ख़ुलूस-े दिल से स्वागत करते हैं।  हमारे इस रव्वैये में शौहरत, दौलत और ओहदे की कोइ हवस नहीं हैं।  यक़ीन जानिये, हमें इस बात के इज़हार में भी तकलीफ़ महसूस होती है।  हम इंतिहाई खुशी के साथ ये तस्लीम करते हैं कि हमारे देश में आज कई ज़बानें बंद हैं मगर साथ ही हमें इस बात का दुख है कि किसी ऐसे निज़ाम को क्यों नहीं लाया जाता जो नफ़रत, त'आसुब और इस्तेहसाल की बहुत ही लम्बी, काली, और ज़हरीली ज़बानें जड़ से काट ले ताकि इस देश की कोमल धरती सदियों की थकन से आज़ाद हो सके।....

...मज़ामीन के 145 भरपूर सफ़हात - इश्तिहारात बिलकुल अलग से।  ये शुमारा ज़िंदगी की पहली ख़ुशी और बौखलाहट में अपनी हदों से बहुत आगे निकल गया है।  याद रहे की अदबी चौपाल के दुसरे शुमारे 120 सफ़हात ही घेर सकेंगे।...   

कुछ लोग दाल रोटी भी नहा के, साफ़ सुथरी जगह बैठ कर, सलीक़े और तमीज़ से खाते हैं और बाज़ हज़रात, शिकस्ता पुलियों, नालियों के किनारे और ग़लाज़त के ढेरों पर बैठ कर बिरयानी दाब लेते हैं।  ये अपने अपने मिज़ाज और उसके झुकाव की बात है।  'हमलोग' वाले शिकस्ता हाल हैं, मगर नाउम्मीद नहीं।  अपनी बात को ढंग से कहने और सलीक़े से पेश करने का मिराक़ है इन्हें।  

अदबी चौपाल के पीछे न किसी धनवान का हाथ है ना किसी चोर दरवाज़े से आने वाली दौलत की फ़रावानी।  हाँ ख़ुलूस, महब्बत, लगन और सच्चाई की मिशअलें हैं इनके साथ।  और जूनून है इन मिशअलों को हमेशा रौशन रखने का।  सियासी इन्तिक़ाम की आग है ना जाली भुनी अज़मतों की ठंडी राख।  ना कुर्सियों की हवस ना कुर्सीनशीनों को ज़लील-ो-रुसवा देखने की आरज़ू।  ज़िंदगी, अदब, और सहाफ़त - इन तीन दायरों में औरों की कोशिशों से उभरने वाले सच्चे, सिजल और ख़ूबसूरत नक़ूश पर पर्दा डालने की बीमारी है ना अदबी चौपाल की राह से किसी एक या दो-चार या दस-बीस लोगों के लिए कोइ ख़ास इमेज बनाने की बहुत ही बुरी ख़्वाहिश।  

बस प्यार है ज़िंदगी और आदमी से, वाबस्तगी है उसकी उलझनों से, हमदर्दी है उसकी मजबूरी से, और इंतिहाई गहरा रिश्ता है किसी बड़े समाजी इन्क़िलाब से।  तक़सीम और सरहद का कोइ तसव्वुर नहीं है अदबी चौपाल के पास।  हमलोग वाले किसी भी ज़बान की स्क्रिप्ट (script) को उसकी मजबूरी जानते हैं, रस्म-े ख़त की बुनियाद पर फ़िक्र-ो-फ़न की हद बन्दियाँ नहीं करते। उर्दू में हिंदी और हिंदी में उर्दू वालों के लिए बंद दरवाज़ों को खुलवाने चाहते हैं ताकि फ़िक्र-ो-एहसास के ठन्डे-गर्म और गुनगुने पानियों के तेज़ धारे स्क्रिप्ट (script) की रतीली दीवारों को अपने साथ बहा ले जाएँ।  लोगों से मिलिए, पूछिए, फिर सोचिये, और यक़ीन जानिये कि हमलोग वाले निरे कारोबारी लोग नहीं हैं।  दौलत बटोरने और शौहरत कमाने का शौक़ नहीं है इन्हें।  बस अपने ज़ौक़ की बेपनाह वुसअतों में टूट के मेहनत करते हैं और अपनी मेहनत के मीठे फल आपकी ख़िदमत में पेश करना चाहते हैं।  क़बूल फ़रमायें !

- अनवर नदीम 
1-7-1976 



दिलचस्प बात ये है कि आपने जितनी किताबें प्रकाशित की वो सब खुद आपकी थीं सिवाए एक के। अस्ल में अनवर नदीम साहब कारोबारी ज़हन रखते ही नहीं थे।  वो इकलौती किताब जो आपकी नहीं थी पर जिसे आपने हमलोग पब्लिशर्स के तहत शाया (प्रकाशित) किया साग़र मेहदी का शेरी मजमुआ (काव्य संग्रह) दिवांजलि था।


उस किताब में आपने साग़र मेहदी का जो ख़ाका खींचा वो मुलाहिज़ा फरमाएं:

न क्लर्क है, न ठेकेदार; न स्मगलर है, न व्यापारी, न सियासी कीड़ा, न समाज सुधारक; न बूढ़ा, न बेहिस; न मन से कोमल, न तन से निर्बल! टीचर है - बोझल-बुज़दिल, मगर खुद को आज़ाद समझने वाले समाज का ! शाइर है - जंगों, नफ़रतों और हिमाक़तों की राह पर दौड़ती, भागती बीसवीं सदी का ! सांस लेता है आज के कड़वे युग में - मगर बातें करता है मीठी-मीठी ! कभी सोचता है तो ग़ज़ल की पुरानी ज़बान में।  अपने चेहरे पर उदासी को बरतने में कामयाब - ज़रीफ़ भी है और भावुक भी - फ़नकार है - मज़दूर है शब्दों का - मगर अपने लिए शब्दों की नई फ़स्ल काटने से डरता है।  उर्दू शेर-ओ-अदब के कल और आज से वाक़िफ़; माज़ी के लिए बे-अदब और हाल के लिए पुर-शौक़ - मगर लफ़्ज़ों को अपने एहसास का रंग देने में अभी तक नाकामयाब ! काश उसकी रचना-शक्ति अपने पैरों पर खड़ी हो सके ! 

साग़र मेहदी 

 

Saturday, July 9, 2022

भाईचारे का पैग़ाम

 

छोटे-छोटे, बड़े और काफ़ी बड़े

दायरे हैं यहां जज़्ब-ो-फ़िक्र के

क्या समाजी रव्वैयों की बातें करें

क्या सियासी तग़य्युर के सपने बुनें 

जान-ो-तन पर ग़ुबारे ग़म-े -ज़िन्दगी

रूह चीख़ा करे रौशनी, रौशनी 

दीन के, फ़िक्र के, धर्म के दायरे

हर कहीं कुछ उसूलों के दुँधले दिए 

सरहदों के इधर भी वही ज़िंदगी

सरहदों के उधर भी यही ज़िन्दगी 

ज़ुल्मतें, ठोकरें, ख़ौफ़, बेचारगी

नफ़रतों की वही एक अंधी गली 

ऐसे माहौल में, ऐसे हालात में

ये बताये कोई ज़ख्म-खुर्दा-बशर सांस लेने की ख़ातिर कहाँ तक जिए !

रूह के कर्ब की सारी तशनालबी है अज़ल से इसी एक अंदाज़ की ! 

दिल को पूजा की सूरतगरी चाहिए

हम को रोज़ों की ज़िंदादिली चाहिए 

ताकि हर साल खुशियों का तोहफ़ा मिले

रूह को पाक रखने का जज़्बा मिले 

ईद का चाँद हर साल खिलता रहे

भाईचारे का पैग़ाम मिलता रहे 

ईद का चाँद हर साल खिलता रहे 

- अनवर नदीम (1937-2017)





Friday, August 27, 2021

"फ़ैसला" | अनवर नदीम (1937-2017) | "The Choice" | Anwar Nadeem (1937-2017) | Translation: Mehak Burza


सांस मिली है, जी सकते हैं

आंख मिली है, रो सकते हैं

दिल की बाज़ी हारो, जीतो

ख़ुशियों के अम्बार लगाओ

फिर भी इतनी बात तो जानो

अपने दिल से इतना पूछो

मेरे दौर के लोगो, सोचो

आने वाली नस्लें तुम से क्या पूछेंगी, इतना जानो

मेरे दौर के प्यारे लोगों, ठहरो, संभलो, जागो, सोचो


आने वाली नस्लें तुम पर नाज़ करें ये हो सकता है

आने वाली नस्लें तुम से लेकिन ये भी कह सकती हैं

तुम ने उन की रचना की है

तुम हो उनके असली दुश्मन

तुम ने उनको क़त्ल किया है

तुम ने उनको ज़हर दिया है

तुम ने बिफरे तूफ़ानों को

झूठ कपट से मोड़ दिया है

उजले रौशन इंसानों के

ख़्वाब का दर्पन तोड़ दिया है

तुम ने अपनी औलादों को

बीच अधर में छोड़ दिया है

आने वाली नस्लें तुम को

अपना क़ातिल ठहराएंगी

सांस मिली है, जी सकते हो

आँख खुली है, रो सकते हो


- अनवर नदीम (1937-2017)


The Choice


You have got breath, you can live,

You have got eyes, you can cry

Whether you win or lose the bettings of the heart

Or stack up happiness

Still you should know this much

O people of my era, ask your heart, think

What will the coming generations ask of you, think,

Dear people of my era, stop, be cautious, wake up and think


That coming generations will be proud of you is a possibility,

Yet they can tell you this

You have created them,

You are their real enemy

You have slain them,

You have poisoned them

You have diverted the troubled storms by your fraudulent guileless

You have broken the mirror of dreams that shone bright

You have left your children midway

The coming generations will

Declare you as their murderer

You have got breath, you can live,

You have your eyes open, you can cry


- Anwar Nadeem (1937-2017) | Translated by Mehak Burza




Saturday, August 14, 2021

एक पुराना हल" | अनवर नदीम (1937-2017)" | ایک پرانا حل | انور ندیم (1937-2017)


ہ سچ ہے کہ مسائل ہمیں ورثے میں ملے ہیں

گر ہم مسائل کو حل کرنے کی کوشش بھی نہیں کرتے

شاید الجھنوں کو سلجھانے کا گر ہمیں معلوم ہی نہیں ہے

الات یقینن  بہت برے ہیں

کیوں نہ پھر یہی کیا جائے

کی پڑوسی ہمیں اور ہم پڑوسی کو اکسائیں

تاکہ بارود ننگے مسائل کو اپنی چادر میں لپیٹ لے


ये सच है कि 

मसाइल हमें विरसे में मिले हैं 

मगर हम 

मसाइल को हल करने की कोशिश भी नहीं करते 

शायद उलझनों को सुलझाने का गुर 

हमें मालूम ही नहीं है।  

हालात यक़ीनन बहुत बुरे हैं 

क्यों न फिर यही किया जाये 

कि पड़ोसी हमें 

और हम पड़ोसी को उकसाएं 

ताकि बारूद 

नंगे मसाइल को 

अपनी चादर में लपेट ले।  

- अनवर नदीम (1937-2017) 

"मैं" | अनवर नदीम (1937-2017)


मैं वो हूँ जिसे तुम नहीं जानते

जिस का जानना तुम्हारे लिए ज़रूरी नहीं 

जो अजनबी है, न क़रीबी दोस्त 
जो दूर है, न पास 
जो मैं है, न तू

मैं वो हूँ जो तुम्हारी ही ज़ात में गुम है।  

- अनवर नदीम (1937-2017)



Sunday, August 8, 2021

सूरत-ए-हाल | अनवर नदीम (1937-2017)



बस वही नक़ाब, झूमर, लचका, गोटा, अफ़्शां और ग़रारा 

बस वही कवाब, कोफ़्ते, रोग़न जोश, चपाती, पराठे और बिरयानी 

बस वही तेज़, ख़ुशबूदार गर्ममसालों की दादागिरी 

बस वही शीरमाल, सिवईं और बालूशाही की जलवागिरी 

बस वही लंतरानी में बहुत कुछ छुपा लेने की कोशिश 

बस वही शीन, क़ाफ़ की फिसलन पर तमसख़ुर की बौछार 

बस वही सर्वजन बस्तियों में दूरियों के ख़तरनाक कांटे 

बस वही ग़ज़ल के पीछे उर्दू शाइरी का बहुत लम्बा क़ाफ़िला 

बस वही शेरी किताबों का ज़ख़ीरा, बेरूह ज़हनों का मुकालमा 

बस वही दस पन्द्रह मौज़ूआत, ग़ज़ल फ़ैक्टरी का सब कुछ 

बस वही थके हारे क़लम का अफ़सोसनाक अन्जाम 

बस वही ग़ज़ल से बेज़ार इल्म-ो-दानिश का रवय्या 

- अनवर नदीम (1937-2017)

 

Saturday, June 19, 2021

"दर्द का मरहम" | अनवर नदीम (1937-2017)



यादें मीठी भी होती हैं 

यादें कड़वी भी होती हैं 

यादें जी बहला सकती हैं 

यादें मन तड़पा सकती हैं 

यादें हम को डस लेती हैं 

यादें अमृत भी लाती हैं 


जीवन के पेचीदा रिश्ते 

कांटे, पत्थर, जटियल, मैदां 

बोझल पैकर, ज़ख़्मी रूहें 

ख़ून ख़राबा, ठोकर, चोटें 

मंज़िल ऐसा प्यारा सपना 

जिस पर सारी दुनिया मरती 

सब की मंज़िल अब तक ओझल 

फिर भी इस की चाहत बेकल 


ओझल मंज़िल की राहों में 

ज़ख़्मी, चोटों के जंगल में 

यादों के मरहम से शायद 

मन के गहरे घाव भरेंगे ! 


यादें मीठी हो सकती हैं 

मरहम भी ठंडा होता है 

यादें कड़वी हो सकती हैं 

मरहम भी कुछ लग सकता है !


- अनवर नदीम (1937-2017)


Wednesday, March 10, 2021

"कैसी कही" | अनवर नदीम (1937-2017) | "How is it?" | Anwar Nadeem (1937-2017) | Translation: Ghulam Rizvi 'Gardish'



हमारे देश में हुकूमतें काम नहीं करतीं 

पार्टियां इलेक्शन लड़ती हैं 

चुनाव जीत के ऐश करती हैं 

और इलेक्शन हार के वबाल।  

- अनवर नदीम (1937-2017)



The governments do not function 

In our country 

The parties

After winning the elections 

Have a bed of roses - 

Orgies, animal gratifications, 

Passing days and nights 

In luxurious enjoyment!

And perchance - 

If they lose the elections

There's a wrangling jade - 

Infuriate,

Quarrelsome,

Pugnacious,

Inordinate,

They finally go to Jericho!

- Anwar Nadeem (1937-2017)

(Translated from Urdu by Ghulam Rizvi 'Gardish')



"मजबूरी" | अनवर नदीम (1937-2017) | "Compulsion" | Anwar Nadeem (1937-2017) | Translation: Ghulam Rizvi 'Gardish"



ऐसी दुन्या जिस में हम तुम 

ज़ुल्म-ो-सितम की चक्की में 

पिस्ते हैं और पिसकर भी हम 

शुक्र करें, मजबूरी है, 

ये कैसी मजबूरी है।  

- अनवर नदीम (1937-2017)



Compulsion

Such a wretched world 

Wherein 

We are ever grinded 

Between the two sides of a mill-stone

And even 

After the tedious process

Haplessly 

Thank God!

Shit! are we here 

Destined to constraint and compulsion 

Nay, coercion, I say? 

How to explain - 

In the damn world

This oppression 

And tyranny of fate? 

- Anwar Nadeem (1937-2017)

(Translated from Urdu by Ghulam Rizvi 'Gardish')


Sunday, November 29, 2020

"सीधी सी बात" |अनवर नदीम (1937-2017) | "Sīdhī sī Bāt" | Anwar Nadeem (1937-2017) | Translation: Saira Mujtaba


हर एक शहर को नफ़रत है इब्न-े आदम से 

हर एक मक़ाम पे मेला है तल्ख़-कामी का 

हर एक अहद में सूली उठाये फिरते हैं 

वो चंद लोग जो दुनिया से दूर होते हैं 

वो लोग जो ठोकर पे मार देते हैं 

कुलाह-ो-तख़्त-ो-सियासत की अज़मतें सारी 


ज़मीं उन्ही को पयाम-े हयात देती है 

वही पयाम जिसे तुम अजल समझते हो 

Har ék śahar ko nafrat hai ibn-é-ādam sé
Har ék maqām pé mélā hai talkh-kāmī kā
Har ék ahad méin sūlī uthāyé phirté haiṅ
Vo chand log jo duniyā sé dūr hoté hain
Vo chand log jo thokar pé mār dété hain
Kūlāh-o-takht-o-siyāsat kī azmatéin sārī
Zamīṅ unhīṅ ko payām-é-hayāt détī hai
Vahī payām jisé tum ajal samajhté ho





Every city despises the children of Adam,
Every place has a fair of bitterness,
Carrying the cross and roaming about in each era,
Those few people who are distant from this world,
Those few people who spurn at
The glory of crown, throne, political power,
The earth chooses them to give the message of Life,
The message that you understand as death.

- Anwar Nadeem (1937-2017)

English translation by Saira Mujtaba


Tuesday, November 3, 2020

"Asīr-é-Jamā’at" | Anwar Nadeem (1937-2017) | "असीर-े जमा'ात" |  अनवर नदीम (1937-2017) | Translation: Saira Mujtaba

 



Ae méré dosto!

Ae méré sāthiyo!

Tum isī ahad ké

Meiṅ isī daur kā

Zindagi kā alam

Ātmā ki khuśī

Tīragī kā sitam

Rauśnī kī kamī

Gham tumhārā, méré dil kā méhmān hai

Mérā gham hai tumharé diloṅ méin makīṅ

Zindagi ko magar dékhné ké liyé

Sochné ké liyé, nāpné ké liyé

Zindagi ko baratné kī khātir magar

Zāviyā bhī alag

Fāsla bhī alag

Hauslā bhī alag

 

            Tum uthāyé ravāyat kī bhārī salīb

Tum baghal méiṅ dabāyé purānī kitāb

Tum jo lafzoṅ ké darpan ko chhū lo agar

Chhūt jāyé vahīṅ dast-é-tāsīr sé

 

Tum purāné zamānoṅ sé mānūs ho

Tum ki bujhté charāġhoṅ kī taqdīr ho

Tum asīr-é-jamā’at, méré sāthiyo!

Tum kahāṅ fardiyat ko karogé qabūl

 


My friends!

My Comrades!

You’re of this age,

I’m too of this epoch,

The flag of Life

The bliss of the soul

The gloom of tyranny

The void of light,

Your sorrow is my heart’s guest

My sorrow resides in your heart

But in order to witness Life

To ponder over it, to measure it,

To make use of this life,

Having a different angle,

A different distance,

A different spirit.

 

You carry the heavy cross of traditions,

You thrust an archaic book under your arms,

If only you touch the mirror of words

Your hands would let go off their impressions.

You’re stuck to the eras gone by,

For you’re the fate of flickering lamps,

You’re chained to a herd mentality, my comrades!

Why would you approbate individuality?


- Anwar Nadeem (1937-2017)

Translated from Urdu by Saira Mujtaba