Monday, January 6, 2020

"एक बुरी सूरत-ए-हाल" | अनवर नदीम (1937-2017)



दो चार नहीं, सैंकड़ो
बहुत बुरी बातें हो गयीं
फिर भी कुछ लोग
यही समझ के बैठ रहे
अब कुछ नहीं हो सकता। 

मालूम नहीं फिर किस ने उकसाया
नमाज़ें पढ़ने लगे
और अपने दीन को समझने की
संजीदा कोशिशों में
एक दुसरे से
दूर होते गए। 

- अनवर नदीम (1937-2017)

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