Tuesday, August 21, 2018

"वो जिस ने ज़बान दी है, उसी का लेते हैं नाम पहले" | अनवर नदीम (1937-2017)


हकीम-ए-अव्वल, हकीम-ए-आख़िर
ज़मीन-ो-आकाश की हदों में
हदों के बाहर की ज़िंदगी में
उसी की बातें हुआ करेंगी
उसी का डंका बजा करेगा !

उसी ने हमको ज़बान दी है
क़लम की दौलत भी दे चुका है
वही मुहाफ़िज़ है ज़िंदगी का
उसी के आगे है सजदा रेज़ी
वही तो सब कुछ अता करेगा !

ख़ुदी का पैकर हक़ीर इंसां
तमाम वहम-ो-गुमां का मालिक
ज़मीं को अपनी समझ रहा था
समझ रहा था कि सारा आलम
उसी के क़ब्ज़े में आ गया है
कभी न बदलेगी ये हक़ीक़त
खुदा की मर्ज़ी रहेगी ग़ालिब
कभी अन्धेरा कभी उजाला
कभी तबाही में शादकामी
न जाने क्या क्या हुआ करेगा !

उसी की चौखट पे आओ बैठो
उसी के आगे ज़बान खोलो
वही तो ज़ख्मों का चारागर है
वही तो रहमत का एक पैकर
वही सुकून-ो-क़रार देगा
तमाम दुनिया की दास्तानें
तमाम दर्द-ो-अलम के क़िस्से
लतीफ़-ो-दिलकश अज़ीम नग़मे
अज़ल से अब तक सुने हैं उसने
वही हमेशा सूना करेगा !

हर एक दिन के हर एक पल में
हमारी साँसों का इम्तिहां है
निज़ाम-ए-हस्ती के इस अमल से
बताओ कोई कहाँ बचा है
बक़ा किसी को नहीं मिली है 
बक़ा किसी को नहीं मिलेगे
हमारा ईमां रहे सलामत
वही तो ज़ुल्म-ो-सितम का मरकज़
पलक झपकते फ़ना करेगा !

उसी की हिकमत तराशती है
कसीफ़ दुनिया में ऐसे चेहरे
जो ज़िंदगी को हंसी बनाने की
आरज़ू लेके जी रहे हैं
अगर शरारत भरा रवैय्या
हमारी साँसों के साथ होगा
हमारी दुनिया भी ख़ाक होगी
तुम्हारा घर भी जला करेगा !

हकीम-ए-अव्वल, हकीम-ए-आख़िर
ज़मीन-ो-आकाश की हदों में
हदों के बाहर की ज़िंदगी में
उसी की बातें हुआ करेंगी
उसी का डंका बजा करेगा !
(अनवर नदीम)


Friday, August 17, 2018

"उदास फ़रिश्ता" | अनवर नदीम (1937-2017)

 
 
कमसिनी का निखार चेहरे पर
ख्वाहिशों का ख़ुमार आंखों में
उसकी आँखें हैं ठहरे बादल पर
उसका चेहरा है उसकी बाहों में

सामने एक छोटे मैदां में
एक झूले का शोर फूटे है
नन्हे-मुन्ने हज़ार चेहरों को
एक झोले की झोंक थामे है

उसकी बाहों की क़ैद कैसी है
उसके चेहरे पे है थकन ऐसी
जैसे सदियों की ठोकरें खाकर
मुज़महिल बैठ जाए कोइ सदी

मैं जिसे देखने की ख़्वाहिश में
अपने कोठे पे रोज़ आता हूँ
वो फरिश्ता उदास लगता है
उसका ग़म लेके लौट जाता हूँ


(अनवर नदीम)

"राज दुलारे" | अनवर नदीम (1937-2017)



घर आंगन के फूल हैं कितने, कोमल, सुन्दर, भोले-भाले
इन के दम से हंस देता है
दुखिया के संसार का जीवन
ये माटी के पुतले न्यारे
इन पे निछावर प्यार का जीवन

घर आंगन के फूल हैं कितने, कोमल, सुन्दर, भोले-भाले 
ये अपनी तुतली भाषा में
कह जाते हैं प्यार की गाथा
फैल रही है सारे जग में
एक इसी मुस्कान की भाषा

घर आंगन के फूल हैं कितने, कोमल, सुन्दर, भोले-भाले 
ये ममता के राज दुलारे
दीन-धरम के द्वार न जाएं
कोइ भी इन से रूठ न पाए
ये भगवान् को साथ खिलाएं

घर आंगन के फूल हैं कितने, कोमल, सुन्दर, भोले-भाले 
काले-गोरे, उजले-मैले
सब की खुशियों के रखवाले
इन के द्वार से जीवन पाने
सारी दुनिया हाथ पसारे

घर आंगन के फूल हैं कितने, कोमल, सुन्दर, भोले-भाले

(अनवर नदीम)


Tuesday, August 14, 2018

"ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे" | अनवर नदीम (1937-2017)



ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे
सर ज़मीन-ए -वतन तू सलामत रहे
तुझ को हर साल जश्न-ए -मसर्रत मिले
हर ज़माने में सच्ची मुहब्बत मिले
अपने बेटों से तुझको अक़ीदत मिले
वक़्त पड़ने पर उनकी शुजाअत मिले

ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे

तुझको हर दौर में भाईचारा मिले
अम्न का शान्ति का नज़ारा मिले
ज़िन्दगी की नयी एक धारा मिले
अज़मत-ो-शादमानी दोबारा मिले

ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे

पर्वतों पर तुझे पाक सांसें मिलें
जंगलों में अछूती फ़ज़ाएँ मिलें
रेगज़ारों में हस्ती की राहें मिलें
बस्तियों में मसर्रत की शामें मिलें

ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे

तेरे मासूम बच्चे न सोचें कभी
उनपे तेरी हुकूमत की गोली चली
आदमियत ज़माने में रुसवा हुई
दूर तुझसे हमेशा रहे बेहिसी

ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे

बदलियां तुझ पे रहमत की छाने लगें
फिर फ़ज़ाएँ तिरी गुनगुनाने लगें
फिर बहारें तिरी मुस्कुराने लगें
तेरे फनकार फिर गीत गाने लगें

ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे

सब का ईमान, तेरी अमानत रहे
सब का एहसास तेरी हरारत रहे
सब की ज़िंदादिली तेरी ताक़त रहे
तुझ में बाक़ी हमेशा शराफत रहे

ऐ ज़मीन-ए-वतन ! तू सलामत रहे

- अनवर नदीम (1937-2017)
 
 

"आज़ाद वतन बेदार रहे" | अनवर नदीम (1937-2017)


इक बात हमें भी कहना है, आज़ाद वतन के लोगों से
मज़दूरों से, बंजारों से, फ़नकारों से, बेचारों से

इस देश के चप्पे चप्पे पर जब ख़ून बहाया ग़ैरत ने
जब ज़ुल्म से टक्कर लेने का तूफ़ान उठाया ग़ैरत ने
जब बूढ़ी नस्लें चीख़ पड़ीं, जब कमसिन बच्चे जाग उठे
जब बेजां पत्थर बोल पड़े, जब नाज़ुक शीशे जाग उठे
बाज़ार में जब बेदारी थी, जब खेतों में चिंगारी थी
आज़ाद वतन के ख़्वाबों की हर पैकर में सरशारी थी
हर जज़्बा जब ख़ुदग़र्ज़ी का, जीने की तड़प खो जाता था
जब दौलत,  इज़्ज़त, शोहरत को ठोकर पे मारा लोगों ने
आज़ाद वतन की चाहत में जब मौत को चूमा लोगों ने
जब आज़ादी की नेमत ही इस जीवन का आधार हुई
तब आज़ादी के सपनों की रंगीं दुनिया साकार हुई
पर जान से प्यारी आज़ादी, तारीख़ का सीधा मोड़ नहीं
इस जान से प्यारी नेमत का संसार में कोई जोड़ नहीं
आज़ाद वतन आबाद रहे, ख़ुशहाल रहे, बेदार रहे
चौपाल कहे, सरकार सुने, घर बार बसे, बाज़ार सजे

इक बात हमें भी कहना है, आज़ाद वतन के लोगों से
मज़दूरों से, बंजारों से, फ़नकारों से, बेचारों से 

अनवर नदीम (1937-2017)
 
 

"कहते हैं जिसे हिन्द" | अनवर नदीम (1937-2017)



ऐसा तो कोइ देश ज़माने में नहीं है  
हर दीन इसी ख़ाक पे सदियों से मकीं है  
दुन्या का वतन है तो यही एक ज़मीं है  
कहते हैं जिसे हिन्द वही मेरा वतन है.

 
 












मिट्टी है इसी देश की यकताये-ज़माना  
छेड़ा है इसी ख़ाक पे गंगा ने तराना  
है ताज, महब्बत की बलंदी का फ़साना  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.
 

उभरी है इसी देश से गौतम की कहानी,
गाँधी से मिली हमको महब्बत की निशानी  
नेहरू से मिली फ़िक्र--सियासत को रवानी
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.

बंगाल की जुल्फों की सियाही का वतन है  
जज़्बात की मासूम-निगाही का वतन है  
हर ज़ुल्म की भरपूर तबाही का वतन है  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.

कश्मीर के फूलों का चमन देखने वालो  
मासूम रवाजों का चलन देखने वालो  
तहजीब की पाकीजा किरन देखने वालो  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.

सरजू के किनारे, कभी गंगा के किनारे  
हर घाट पे मौजूद हैं संतों के दुलारे  
होते हैं शबो-रोज़, अकीदत के नजारे  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.

कहते हैं किसे जोश, ये पंजाब से पूछो  
आरिज़ पे दमकते हुए महताब से पूछो  
तारीखे-जुनूं-खेज़ के इक बाब से पूछो  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.


वो रेत के टीले हैं की जाटों का नगर है  
वो कैसे खनकते हुए वादों का नगर है  
मरदाना रवय्यों के तमाशों का नगर है  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.



 











गुजरात की तारीख, कि मैसूर की रूदाद
बरसों रही इस ख़ाक पे इक जंग सी आबाद  
अब रूहे-वतन हो नहीं सकती कभी नाशाद  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.


हरयाना, उडीसा, कि हिमाचल का इलाका  
होता है शबो-रोज़ पसीने का नज़ारा  
महनत का पसीना है, महब्बत का तमाशा  
कहते है जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.


शिवा के नए देश से तामिल के तकाजे  सुनते हैं बड़े प्यार से केरल के फ़साने  
भोपाल के, पटना के, निज़ामों के चहीते  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है


ये देश, नए गीत के संगीत का मरकज़  
रक्कास के पैरों की नयी रीत का मरकज़  
अफ़कारे-सियासत की नयी जीत का मरकज़  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है

सागर से नए दौर की आती हैं सदायें  
हर दिल से गुज़रती हैं महब्बत की हवाएं  
इक रोज़ तो छट जायेंगी फ़िक्रों की घटायें  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.

इस देश का इक नाम है पाकीज़ा महब्बत  
इस देश का इक नाम है दस्तूरे-सखावत  
इस देश का इक नाम है तारीख़-ए-शुजाअत  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.
 
ये मेरा वतन, तेरा वतन, सबका वतन है  
खुशियों का, मुरादों का, इरादों का चमन है,  
इस दौर में इन्सान-नवाज़ी की लगन है  
कहते हैं जिसे हिन्द, वही मेरा वतन है.

अनवर नदीम (1937-2017)